लास्ट मैन इन टावर अरविंद अडिगा के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित बेन रेखी के निर्देशन में बनी हिंदी ड्रामा फिल्म है। फिल्म में मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता, बोमन ईरानी और सुकांत गोयल जैसे कलाकार नजर आते हैं। फिल्म 11 सितंबर 2026 को रिलीज हुई है। कहानी मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी के उन सदस्यों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पुनर्विकास के एक प्रस्ताव को लेकर आपस में भिड़ जाते हैं। शुरुआत में यह विवाद दो लोगों के बीच होता है, लेकिन जल्द ही लालच, अकेलेपन, नैतिकता और त्याग की बड़ी कहानी बन जाता है।
लास्ट मैन इन टावर फिल्म की जानकारी
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| फिल्म का नाम | लास्ट मैन इन टावर |
| रिलीज की तारीख | 11 सितंबर 2026 |
| शैली | ड्रामा |
| निर्देशक | बेन रेखी |
| लेखक | Aravind Adiga |
| निर्माता | राणा दग्गुबाती, बेन रेखी, गुनीत डोगरा, प्रतीक्षा राव |
| मुख्य कलाकार | मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता, बोमन ईरानी, सुकांत गोयल, चंदन रॉय सान्याल, स्वरूपा घोष |
| ओटीटी मंच | घोषणा नहीं हुई है |
| रेटिंग | 3.5/5 |
फिल्म की अवधि करीब 1 घंटा 37 मिनट है और इसे 11 सितंबर 2026 को हिंदी में सिनेमाघरों में रिलीज किया गया है।
लास्ट मैन इन टावर की कहानी
फिल्म के मुख्य किरदार योगेश मिश्रा हैं, जिन्हें प्यार से मास्टरजी भी कहा जाता है। उनका किरदार मनोज बाजपेयी ने निभाया है। मास्टरजी मुंबई के वकोला इलाके में स्थित पुराने आवासीय परिसर विश्राम में रहने वाले सेवानिवृत्त स्कूल शिक्षक हैं। लेकिन उनकी जिंदगी तब बदल जाती है, जब इलाके का बिल्डर धर्मेन शाह (बोमन ईरानी) सभी निवासियों के पास पहुंचता है।
बिल्डर पुराने परिसर को गिराकर वहां एक नया टावर बनाना चाहता है और इसके लिए सभी निवासियों को अपने घर खाली करने के बदले बड़ी रकम देने का प्रस्ताव रखता है। ज्यादातर निवासी इस प्रस्ताव से खुश होते हैं, लेकिन मास्टरजी इसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं।
इसके बजाय वह अपने पुराने घर के प्रति वफादार रहने का फैसला करते हैं। उनका यह निर्णय उन्हें सोसाइटी के दूसरे निवासियों, दोस्तों और यहां तक कि अपने परिवार के सदस्यों के खिलाफ खड़ा कर देता है। श्रीमती पुरी का किरदार दिव्या दत्ता ने निभाया है और उनकी अपनी समस्याएं भी मास्टरजी के घर खाली न करने के फैसले से जुड़ी हैं। इससे मास्टरजी के प्रति उनकी नाराजगी और बढ़ जाती है।
Team Last Man in Tower — actors Manoj Bajpayee and Divya Dutta and director Ben Rekhi — take t2 through their powerful film about urban living in the here and now, the price of principles, and what it means to have the film release in theatreshttps://t.co/ZrJ7HFf4Qb…
— t2 (@t2telegraph) September 10, 2026
लास्ट मैन इन टावर रिव्यू: लालच और बदलाव की वास्तविक कहानी
‘लास्ट मैन इन टावर’ इसलिए प्रभावी साबित होती है क्योंकि यह अपने संघर्ष को साधारण अच्छे और बुरे के मुकाबले में नहीं बदलती। मास्टरजी पूरी तरह अच्छे इंसान नजर नहीं आते और न ही अपनी संपत्ति बेचने की इच्छा रखने वाले लोग बिना किसी कारण के लालची दिखाई देते हैं। फिल्म यह समझने की कोशिश करती है कि आर्थिक स्थिरता और बेहतर भविष्य की इच्छा हर व्यक्ति के फैसलों के पीछे एक वजह हो सकती है।
दूसरी ओर, जब भौतिक लाभ की चाह सबसे ऊपर आ जाती है, तब समुदाय की एकजुटता कितनी आसानी से टूट सकती है, इसे भी फिल्म प्रभावी ढंग से दिखाती है। मास्टरजी के रिश्ते जैसे-जैसे टूटते जाते हैं, परिस्थितियां लगातार खराब होती जाती हैं। फिल्म में एक दिलचस्प राजनीतिक पहलू भी है। पुनर्विकास की योजना उन लोगों के बीच संघर्ष पैदा कर देती है, जो पहले साथ मिलकर शांतिपूर्वक रहते थे। इस व्यक्तिगत विवाद को पूंजीवाद और महत्वाकांक्षाओं जैसे व्यापक मुद्दों से भी जोड़ा गया है।
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मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता का शानदार अभिनय
मास्टरजी के रूप में मनोज बाजपेयी का अभिनय शानदार है। उनका प्रदर्शन केवल अपने घर और सिद्धांतों की रक्षा करने वाले व्यक्ति को नहीं दिखाता, बल्कि यह भी बताता है कि वह निजी कारणों से जिद्दी क्यों हैं। इसी वजह से मास्टरजी किसी आदर्श किरदार के बजाय एक वास्तविक इंसान लगते हैं।
मनोज बाजपेयी जितने प्रभावशाली हैं, उतनी ही सटीकता से दिव्या दत्ता ने श्रीमती पुरी की भूमिका निभाई है। उनके किरदार की अपनी समस्याएं और महत्वाकांक्षाएं हैं, इसलिए निर्देशक उन्हें केवल मास्टरजी की विरोधी बनाकर नहीं छोड़ते। उनके पड़ोसी धर्मेन शाह के रूप में बोमन ईरानी संयमित अभिनय करते हैं, जबकि सुकांत गोयल मास्टरजी के व्यावहारिक सोच रखने वाले बेटे की भूमिका में शानदार नजर आते हैं।
If you can watch one film this week, make it #Lastmanintower It explores our inherent tussle between preserving simpler times, community culture, & embracing the promise of a better tomorrow.Poignant & powerful. Manoj Bajpayee and Divya Dutta are terrific. https://t.co/qvGoyPnuEA
— Renuka Vyavahare (@renukaVyavahare) September 11, 2026
तकनीकी पहलू और दृश्य प्रभाव
फिल्म की शूटिंग मुंबई की वास्तविक जगहों पर की गई है और इसमें यथार्थवादी दृश्य शैली बनाए रखी गई है। पुरानी हाउसिंग कॉलोनी फिल्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है, क्योंकि वह शहर के उस पुराने रूप का प्रतिनिधित्व करती है, जो धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है।
सूनी तारापोरवाला की पटकथा लोगों और उनके आपसी रिश्तों की गतिशीलता पर ध्यान केंद्रित करती है, जबकि जूही चतुर्वेदी के संवाद किरदारों में वास्तविकता का भाव पैदा करते हैं।
कमजोर पक्ष
- भावनाओं का धीमा विकास
- गंभीर विषय
- मनोरंजन की सीमित गुंजाइश
- निराशाजनक अंत
क्या लास्ट मैन इन टावर देखनी चाहिए?
इसे देखें अगर आप:
- यथार्थवादी ड्रामा पसंद करते हैं।
- मनोज बाजपेयी का अभिनय पसंद करते हैं।
- सामाजिक मुद्दों से जुड़ी कहानियां पसंद करते हैं।
- किरदारों पर आधारित फिल्में देखना पसंद करते हैं।
इसे छोड़ सकते हैं अगर आप:
- हल्का-फुल्का मनोरंजन चाहते हैं।
- व्यावसायिक ड्रामा पसंद करते हैं।
- गंभीर विषय पसंद नहीं करते।
- पारंपरिक सुखद अंत की उम्मीद करते हैं।
What happened to Hindi Cinema this weekend? Back to back 4K DCPs. #LastManInTower - adapted from Aravind Adigas novel of the same name, follows the residents of a building a they face a lucrative buyout offer from a real estate developer, Dharman Shah. Most of the residents are… pic.twitter.com/PVx0mQ9UKs
— Parth Chaturvedi (@_mrchaturvedi) September 9, 2026
अंतिम फैसला
‘लास्ट मैन इन टावर’ एक यथार्थवादी ड्रामा है, जो छोटे से पुनर्विकास के मुद्दे को इंसानी स्वभाव से जुड़े एक बड़े संघर्ष में बदल देती है। फिल्म समझती है कि हर व्यक्ति के पास बदलाव स्वीकार करने या उसका विरोध करने की अपनी वजह होती है, लेकिन साथ ही यह भी दिखाती है कि सब कुछ पीछे छोड़ने की एक भावनात्मक कीमत होती है।
मनोज बाजपेयी अपनी भूमिका शानदार तरीके से निभाते हैं और उनके साथ दिव्या दत्ता, बोमन ईरानी और बाकी प्रतिभाशाली कलाकार भी प्रभाव छोड़ते हैं। फिल्म कुछ दर्शकों को धीमी या उबाऊ लग सकती है, लेकिन इसका यथार्थवाद ही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।
रेटिंग: 3.5/5
कुल मिलाकर, ‘लास्ट मैन इन टावर’ उन दर्शकों के लिए एक बार देखने लायक फिल्म है, जिन्हें वास्तविकता के करीब सामाजिक ड्रामा पसंद है। यह फिल्म गंभीर और कुछ हद तक निराशाजनक जरूर है, लेकिन शानदार कलाकारों और उठाए गए विषय की वजह से इसे देखना सार्थक रहता है।
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