एकतरफा प्यार, रिजेक्शन और ‘न’ की अहमियत जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बनी ‘पूजा मेरी जान’ एक जरूरी सवाल उठाती है। मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी स्टारर यह फिल्म दिखाती है कि अगर कोई लड़की किसी रिश्ते के लिए मना कर दे, तो क्या उसके बाद होने वाली हर घटना के लिए उसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? फिल्म का विषय गंभीर है, लेकिन क्या इसकी कहानी और कोर्टरूम ड्रामा उतना प्रभाव छोड़ते हैं? आइए जानते हैं ‘पूजा मेरी जान’ का पूरा रिव्यू।
पूजा मेरी जान मूवी डिटेल्स
| कैटेगरी | जानकारी |
|---|---|
| फिल्म | पूजा मेरी जान |
| कलाकार | मृणाल ठाकुर, हुमा कुरैशी, विक्रम सिंह चौहान, विजय राज |
| लेखक | नवजोत गुलाटी, कनिष्का सिंह देव |
| निर्देशक | नवजोत गुलाटी, विपाशा अरविंद |
| निर्माता | अमर कौशिक, दिनेश विजान |
| रिलीज डेट | 1 अक्टूबर 2026 |
| जॉनर | ड्रामा, कोर्टरूम |
| रेटिंग | 2.5/5 |

पूजा मेरी जान की कहानी क्या है?
पूजा (मृणाल ठाकुर) और अनिकेत (विक्रम सिंह चौहान) दोस्त हैं। अनिकेत पूजा से प्यार करता है और उसे प्रपोज करता है, लेकिन पूजा उसके प्यार को स्वीकार नहीं करती। वह साफ तौर पर रिश्ते के लिए मना कर देती है।
इसके बाद अनिकेत आत्महत्या कर लेता है। उसके पीछे छोड़ा गया ईमेल पूजा को सवालों के घेरे में ला देता है। सोशल मीडिया पर भी अनिकेत की मौत के लिए पूजा को जिम्मेदार ठहराया जाने लगता है। उसकी निजी जिंदगी देखते ही देखते सार्वजनिक बहस का विषय बन जाती है।
पूजा की दोस्त सना (हुमा कुरैशी) पेशे से वकील है। शुरुआत में वह भी पूजा के फैसलों को लेकर सवाल करती है, लेकिन बाद में उसका नजरिया बदलता है और वह पूजा का केस लड़ने का फैसला करती है।
मामला कोर्ट तक पहुंचता है, जहां सना का सामना सरकारी वकील जतिन त्रिवेदी (विजय राज) से होता है। इसके बाद फिल्म रिश्ते और रिजेक्शन से आगे बढ़कर सोशल मीडिया ट्रायल और समाज की सोच पर सवाल उठाती है।
फिल्म का विषय कितना मजबूत है?
फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका विषय है। कहानी यह सवाल करती है कि किसी व्यक्ति को प्यार स्वीकार करने या न करने का अधिकार कितना महत्वपूर्ण है। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि रिजेक्शन के बाद होने वाली घटना के लिए समाज किस तरह दूसरे व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने लगता है।
फिल्म इन मुद्दों को सामने रखती है:
- एकतरफा प्यार और रिजेक्शन।
- ‘न’ कहने के अधिकार की अहमियत।
- सोशल मीडिया पर तुरंत राय बना लेना।
- निजी रिश्तों का सार्वजनिक बहस में बदलना।
- रिजेक्शन के बाद जिम्मेदारी तय करने की सामाजिक सोच।
विषय मजबूत है, लेकिन फिल्म इन सवालों को हर जगह उतनी गहराई से विकसित नहीं कर पाती।
मृणाल ठाकुर की एक्टिंग कैसी है?
मृणाल ठाकुर ने पूजा के किरदार को सहज अंदाज में निभाया है। अनिकेत की मौत के बाद जब पूजा लोगों के सवालों और आरोपों के बीच फंसती है, तब उनके अभिनय में किरदार की परेशानी और अकेलापन दिखाई देता है।
पूजा के कुछ फैसले दर्शकों को जरूर खटक सकते हैं, लेकिन इसकी वजह मृणाल का अभिनय नहीं बल्कि किरदार की लिखावट है। वह अपने किरदार को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने से बचती हैं।

हुमा कुरैशी ने छोड़ा प्रभाव
हुमा कुरैशी सना के किरदार में हैं। वह पूजा की दोस्त होने के साथ वकील भी है। शुरुआत में सना पूजा को लेकर पूरी तरह उसके पक्ष में नहीं होती, लेकिन बाद में वह उसका केस लड़ने का फैसला करती है।
हुमा ने सना के इस बदलाव को सहज तरीके से निभाया है। कोर्टरूम के कुछ दृश्यों में उनकी संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस अच्छी लगती है।

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विक्रम सिंह चौहान और विजय राज का अभिनय
विक्रम सिंह चौहान ने अनिकेत की भावनात्मक स्थिति को ठीक तरीके से पेश किया है। उनके किरदार में प्यार, निराशा और टूटन के भाव नजर आते हैं।
विजय राज सरकारी वकील जतिन त्रिवेदी की भूमिका में हैं। उनका अभिनय सहज है, लेकिन किरदार को ज्यादा मजबूत दलीलें मिलतीं तो कोर्टरूम का टकराव ज्यादा प्रभावी बन सकता था।
सुनीता राजवर भी अपने छोटे किरदार में सहज दिखाई देती हैं।
निर्देशन और कोर्टरूम ड्रामा
निर्देशन की बात करें तो फिल्म अपने मुख्य मुद्दे के आसपास बनी रहती है। कहानी निजी रिश्ते से शुरू होकर पुलिस, सोशल मीडिया और अदालत तक पहुंचती है।
सोशल मीडिया पर बिना पूरी जानकारी के राय बनाने वाला पहलू फिल्म में अच्छी तरह शामिल किया गया है। हालांकि कोर्टरूम के हिस्से में अपेक्षित तनाव लगातार महसूस नहीं होता।
सना और जतिन के बीच वैचारिक टकराव की गुंजाइश काफी थी, लेकिन बहस को और धारदार बनाया जा सकता था। कुछ घटनाएं भी तेजी से आगे बढ़ती हैं, जिससे कहानी का भावनात्मक प्रभाव कम हो जाता है।
पटकथा और लेखन में क्या कमी है?
फिल्म की पटकथा में पूजा और अनिकेत के रिश्ते को लेकर कई सवाल उठते हैं। पूजा को अनिकेत की भावनाओं की जानकारी है, फिर भी दोनों की नजदीकी बनी रहती है। पूजा अपने स्टार्टअप के लिए अनिकेत से 10 लाख रुपये भी लेती है।
यह पहलू कहानी को जटिल बनाता है, लेकिन फिल्म इस रिश्ते की पूरी परतें नहीं खोल पाती।
पूजा के दूसरे रिश्तों को भी कहानी में जगह दी गई है, लेकिन उनका मुख्य कहानी से जुड़ाव हमेशा स्पष्ट नहीं रहता। सना के नजरिए में बदलाव भी कुछ जल्दबाजी में आता है। इस हिस्से को ज्यादा समय मिलता तो उसका किरदार बेहतर तरीके से विकसित हो सकता था।
फिल्म में क्या अच्छा है?
- विषय: एकतरफा प्यार और रिजेक्शन पर सवाल उठाता है।
- अभिनय: मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी का प्रदर्शन प्रभावी है।
- सोशल मीडिया एंगल: ऑनलाइन ट्रायल को कहानी का हिस्सा बनाया गया है।
- संवाद: ‘न’ और रिजेक्शन को लेकर कुछ बातें असर छोड़ती हैं।
फिल्म में क्या कमजोर है?
- पटकथा: कहानी कई जगह अपने विषय को पूरी तरह विकसित नहीं कर पाती।
- कोर्टरूम ड्रामा: बहस में लगातार तनाव की कमी महसूस होती है।
- किरदारों का विकास: कुछ बदलाव जल्दबाजी में सामने आते हैं।
- रिश्तों की जटिलता: पूजा और अनिकेत के रिश्ते को और विस्तार मिल सकता था।
पूजा मेरी जान देखें या नहीं?
अगर आपको रिश्तों, एकतरफा प्यार, रिजेक्शन और सोशल इश्यू पर आधारित फिल्में पसंद हैं, तो ‘पूजा मेरी जान’ एक बार देखी जा सकती है। फिल्म का विषय चर्चा को जन्म देता है और कलाकारों का अभिनय इसे संभालता है।
हालांकि, अगर आप मजबूत कोर्टरूम ड्रामा और बेहद टाइट स्क्रीनप्ले की उम्मीद कर रहे हैं, तो फिल्म कुछ जगह निराश कर सकती है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘पूजा मेरी जान’ एक गंभीर विषय को उठाती है और ‘न’ की अहमियत, एकतरफा प्यार और रिजेक्शन के बाद समाज के रवैये पर सवाल करती है। मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी अपने किरदारों में अच्छा काम करती हैं, जबकि विक्रम सिंह चौहान भी प्रभाव छोड़ते हैं।
कमजोर कोर्टरूम ड्रामा और असमान पटकथा फिल्म की सबसे बड़ी कमियां हैं। कुल मिलाकर, फिल्म का विषय मजबूत है, लेकिन उसका execution हर जगह उतना प्रभावशाली नहीं बन पाता।
रेटिंग: 2.5/5
Pros: विषय, अभिनय Cons: पटकथा, कोर्टरूम ड्रामा
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