नखरेवाली एक हिंदी रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है, जिसका निर्देशन राहुल शांकल्या ने किया है। फिल्म में अंश दुग्गल, प्रगति श्रीवास्तव, कुमुद मिश्रा और गोपाल दत्त मुख्य भूमिकाओं में हैं। 30 अक्टूबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई यह फिल्म एक अनोखी कहानी के जरिए आधुनिक रिश्तों, महिलाओं और पुरुषों से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाओं और प्रेम की जटिलताओं को दिखाती है, जिसमें दोनों की पारंपरिक भूमिकाएं उलट जाती हैं।

आनंद एल. राय और हिमांशु शर्मा द्वारा निर्मित यह फिल्म महिला का वेश धारण करने, पहचान को लेकर पैदा हुई गलतफहमियों और परिस्थितियों से उपजे हास्य को महिलाओं का सम्मान करने के संदेश के साथ जोड़ती है। हालांकि, इसकी कहानी जानी-पहचानी लगती है और पटकथा में कुछ असंगतियां भी हैं, लेकिन मुख्य कलाकारों का आत्मविश्वास से भरा अभिनय और मनोरंजक हास्य दृश्य इसे काफी हद तक देखने लायक रोमांटिक कॉमेडी बनाते हैं।

नखरेवाली फिल्म की जानकारी

विवरणजानकारी
फिल्म का नामनखरेवाली
रिलीज तारीख30 अक्टूबर 2026
शैलीरोमांटिक कॉमेडी, ड्रामा
निर्देशकराहुल शांकल्या
लेखकदिव्य निधि शर्मा
आधारितसत्य व्यास के उपन्यास दिल्ली दरबार पर
निर्माताआनंद एल. राय, हिमांशु शर्मा
मुख्य कलाकारअंश दुग्गल, प्रगति श्रीवास्तव, कुमुद मिश्रा, गोपाल दत्त, आकाश मखीजा, आयुषी वर्मा
संगीतवायु, वैभव पाणि, शरण रावत, गौरव चटर्जी, तनिष्क बागची
अवधि2 घंटे 9 मिनट
ओटीटी मंचघोषणा नहीं हुई
रेटिंग3/5

नखरेवाली की कहानी

कहानी उत्तर प्रदेश के हरदोई के रहने वाले सुमित मिश्रा (अंश दुग्गल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो मानता है कि महिलाओं की जिंदगी पुरुषों के मुकाबले ज्यादा आसान होती है। उसकी प्रेमिका की शादी किसी और से हो जाने के बाद सुमित उच्च शिक्षा हासिल करने और अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेने के लिए दिल्ली चला जाता है। वह बटुक (गोपाल दत्त) के घर में किराए पर कमरा लेता है, जहां उसकी मुलाकात बटुक की बेटी परिधि (प्रगति श्रीवास्तव) से होती है।

शुरुआती मुलाकातें धीरे-धीरे आकर्षण में बदल जाती हैं, लेकिन महिलाओं को लेकर सुमित की पुरानी सोच उनके रिश्ते को जटिल बना देती है। हालांकि, सुमित को परिधि के साथ समय बिताना अच्छा लगता है, लेकिन वह अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त करने के कारण उसे गलत समझता है। इसी बीच उसकी दिलचस्पी मिहिका (आयुषी वर्मा) में भी बढ़ने लगती है, जो एक कॉलेज छात्रा है और जिसकी जीवनशैली अलग सामाजिक परिवेश को दर्शाती है। जब सुमित को आखिरकार परिधि के प्रति अपनी भावनाओं का एहसास होता है, तो उसके पिता उनकी शादी पर विचार करने के लिए तभी तैयार होते हैं, जब सुमित एक महीने के भीतर सरकारी नौकरी हासिल कर ले।

नौकरी पाने में असफल रहने के बाद सुमित, सुमिता मिश्रा नाम की महिला का वेश धारण कर लेता है, जिससे कई गलतफहमियां और हास्यपूर्ण परिस्थितियां पैदा होती हैं। आगे की कहानी दिखाती है कि क्या सुमित अपनी असली पहचान छिपाए रख पाएगा, परिधि का विश्वास जीत सकेगा और महिलाओं को लेकर अपनी सोच पर दोबारा विचार करेगा।

नखरेवाली मूवी रिव्यू: जानी-पहचानी कहानी में मनोरंजक हास्य

निर्देशक राहुल शांकल्या फिल्म को एक परिचित रोमांटिक कॉमेडी के ढांचे में प्रस्तुत करते हैं, जिसमें गलत पहचान, रिश्तों की उलझनें और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई परिस्थितियां शामिल हैं। महिला का वेश धारण करने की अवधारणा तुरंत बॉलीवुड की उन दूसरी कॉमेडी फिल्मों की याद दिलाती है, जिनमें ऐसे विचारों का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, नखरेवाली इस भेष बदलने की घटना को महिलाओं और रिश्तों के प्रति सुमित की सोच से जोड़कर खुद को अलग बनाने की कोशिश करती है।

फिल्म के पहले भाग में जीवंत बातचीत, मजेदार परिस्थितियां और किरदारों के बीच हास्यपूर्ण संवाद देखने को मिलते हैं। कई चुटकुले इसलिए प्रभावी लगते हैं, क्योंकि वे सुमित के व्यक्तित्व और उसकी लगातार उलझती परिस्थितियों से स्वाभाविक रूप से पैदा होते हैं। दूसरे भाग में भी गलतफहमियों से पैदा हुआ हास्य जारी रहता है, हालांकि पटकथा कभी-कभी अनुमान लगाने योग्य हो जाती है। इन कमियों के बावजूद फिल्म में पर्याप्त मनोरंजक पल हैं, जो इसे देखने लायक बनाए रखते हैं।

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अंश दुग्गल और प्रगति श्रीवास्तव का अभिनय

अंश दुग्गल ने सुमित मिश्रा के किरदार में आत्मविश्वास से भरा अभिनय किया है। वह किरदार के अहंकार, प्रेम संबंधी उलझनों और हास्यपूर्ण परिस्थितियों को उत्साह के साथ निभाते हैं। सुमित के सुमिता की पहचान अपनाने के बाद उनका अभिनय विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। इस भूमिका में उन्हें दो विपरीत व्यक्तित्वों के बीच बदलाव करना पड़ता है और वह कई हास्यपूर्ण पलों को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत करते हैं।

प्रगति श्रीवास्तव परिधि के किरदार में आकर्षण और आत्मविश्वास लेकर आती हैं। उनका किरदार बेबाक है, स्वतंत्र है और रिश्तों को लेकर सुमित की सीमित सोच स्वीकार करने को तैयार नहीं है। दोनों कलाकारों के बीच का तालमेल उनके रोमांटिक दृश्यों को दिलचस्प बनाता है, भले ही पटकथा परिचित संघर्षों पर निर्भर रहती है।

गोपाल दत्त बटुक के किरदार में विशेष रूप से मनोरंजक हैं। उनका संवाद बोलने का अंदाज और हास्य का सही समय फिल्म के कुछ सबसे मजेदार पल प्रस्तुत करता है। कुमुद मिश्रा एक सरकारी अधिकारी की सहायक भूमिका में विश्वसनीयता जोड़ते हैं, जबकि आकाश मखीजा सुमित के दोस्त झाड़ी के रूप में हास्य लेकर आते हैं। आयुषी वर्मा भी मुख्य किरदार के प्रेम संबंधों से जुड़ी उलझनों को बढ़ाने में योगदान देती हैं।

कहानी और पटकथा

दिव्य निधि शर्मा की पटकथा हल्के-फुल्के मनोरंजन को लैंगिक असमानता और आधुनिक रिश्तों पर टिप्पणियों के साथ जोड़ने की कोशिश करती है। सुमित का यह विश्वास कि महिलाओं को अनुचित फायदे मिलते हैं, कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। सुमिता का वेश धारण करने के दौरान उसके अनुभव इन धारणाओं को चुनौती देने के लिए रखे गए हैं। हालांकि, फिल्म हमेशा अपने सामाजिक संदेश की पर्याप्त गहराई से पड़ताल नहीं कर पाती।

कुछ परिस्थितियां महिलाओं के रोजमर्रा के अनुभवों की वास्तविकता को समझने के बजाय हंसी पैदा करने पर ज्यादा केंद्रित रहती हैं। प्रेम संबंधों के संघर्ष भी अनुमान लगाने योग्य ढर्रे पर चलते हैं, जिससे कुछ घटनाक्रमों का भावनात्मक प्रभाव कम हो जाता है। इसके बावजूद पटकथा में पर्याप्त मजेदार संवाद और मनोरंजक परिस्थितियां हैं, जो कहानी को पूरी तरह दोहराव भरी होने से बचाती हैं।

महिला के वेश में कॉमेडी और पारंपरिक भूमिकाओं का उलटफेर

फिल्म में हास्य का मुख्य आधार सुमित का नौकरी पाने और परिधि से शादी की संभावनाएं बेहतर करने के लिए खुद को महिला के रूप में प्रस्तुत करना है। इससे गलत पहचान, असहज मुलाकातों और अप्रत्याशित उलझनों के कई अवसर पैदा होते हैं। हास्य सबसे ज्यादा तब प्रभावी होता है, जब सुमित अपने फैसलों के परिणामों को संभालने में संघर्ष करता है। उसका यह बदलाव फिल्म को महिलाओं की जिंदगी के बारे में उसकी धारणाओं पर सवाल उठाने का मौका भी देता है।

हालांकि, प्रस्तुति कभी-कभी नए विचारों के बजाय महिला का वेश धारण करने से जुड़े परिचित चुटकुलों पर निर्भर हो जाती है। फिल्म का सामाजिक संदेश स्पष्ट है, लेकिन उसकी प्रस्तुति अपेक्षाकृत सरल बनी रहती है। महिलाओं और पुरुषों से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाओं की अधिक विचारशील पड़ताल इस कॉमेडी को ज्यादा मौलिक बना सकती थी।

रोमांस, कलाकारों का तालमेल और भावनात्मक प्रभाव

सुमित और परिधि का रिश्ता फिल्म का भावनात्मक केंद्र है। उनके विपरीत व्यक्तित्व कई मजेदार असहमतियां पैदा करते हैं, खासकर इसलिए क्योंकि परिधि सुमित के दोहरे मापदंडों को स्वीकार करने से इनकार करती है। अंश दुग्गल और प्रगति श्रीवास्तव पर्दे पर सहज दिखाई देते हैं, जिससे रोमांटिक हिस्से दिलचस्प बने रहते हैं।

हालांकि, पटकथा कभी-कभी सुमित के भावनात्मक बदलाव को विश्वसनीय बनाने में संघर्ष करती है। उसके नजरिए में बदलाव सोच-समझकर विकसित की गई व्यक्तिगत यात्रा के बजाय कहानी की जरूरतों से अधिक जुड़ा हुआ लगता है। फिल्म एक गहरे भावनात्मक रिश्तों वाले ड्रामा के मुकाबले हल्की-फुल्की रोमांटिक मनोरंजक फिल्म के रूप में बेहतर काम करती है।

संगीत, निर्देशन और तकनीकी पहलू

राहुल शांकल्या फिल्म की रंगीन प्रस्तुति और ऊर्जावान हास्य दृश्यों के जरिए चंचल माहौल बनाए रखते हैं। संगीत रोमांटिक कहानी के अनुरूप है, जिसमें वायु, वैभव पाणि, शरण रावत, गौरव चटर्जी और तनिष्क बागची का योगदान है। गाने फिल्म के हल्के-फुल्के पलों को सहारा देते हैं और ज्यादा ध्यान भी नहीं भटकाते।

हालांकि, तकनीकी प्रस्तुति में कुछ स्पष्ट कमजोरियां हैं। सुमिता के वेश में सुमित का रूप हमेशा एक जैसा नहीं रहता, खासकर जब एक-दूसरे से सीधे जुड़े दृश्यों के बीच उसके चेहरे के बाल बदल जाते हैं। ये निरंतरता संबंधी गलतियां ध्यान भटकाती हैं, क्योंकि भेष बदलना मुख्य कहानी का जरूरी हिस्सा है। फिल्म की 129 मिनट की अवधि संभालने योग्य है, हालांकि अधिक चुस्त संपादन कुछ दृश्यों की रफ्तार बेहतर बना सकता था।

फिल्म की कमजोरियां क्या हैं?

  • महिला का वेश धारण करने की परिचित अवधारणा
  • अनुमान लगाने योग्य रोमांटिक संघर्ष
  • दृश्यों की निरंतरता में स्पष्ट गलतियां
  • सामाजिक मुद्दों की सरल व्याख्या

क्या नखरेवाली देखनी चाहिए?

फिल्म देखें अगर आप:

  • हल्की-फुल्की बॉलीवुड रोमांटिक कॉमेडी पसंद करते हैं।
  • गलत पहचान और महिला का वेश धारण करने से पैदा होने वाला हास्य पसंद करते हैं।
  • नए मुख्य कलाकारों और सहायक कलाकारों के मनोरंजक अभिनय की सराहना करते हैं।
  • रोमांस और कॉमेडी से भरपूर सरल फिल्में पसंद करते हैं।

फिल्म न देखें अगर आप:

  • पूरी तरह मौलिक रोमांटिक कहानी की उम्मीद करते हैं।
  • सूक्ष्म और सार्थक सामाजिक टिप्पणियों को प्राथमिकता देते हैं।
  • अनुमान लगाने योग्य रिश्तों के संघर्ष पसंद नहीं करते।
  • निरंतरता संबंधी गलतियों के बिना तकनीकी रूप से सधी हुई कहानी देखना चाहते हैं।

अंतिम फैसला

नखरेवाली एक जानी-पहचानी, लेकिन मनोरंजक रोमांटिक कॉमेडी है, जिसे कलाकारों के ऊर्जावान अभिनय और हास्यपूर्ण परिस्थितियों से फायदा मिलता है। राहुल शांकल्या का निर्देशन माहौल को हल्का-फुल्का बनाए रखता है, जबकि अंश दुग्गल और प्रगति श्रीवास्तव मुख्य रिश्ते में ताजगी लेकर आते हैं। गोपाल दत्त का बेहतरीन हास्य अंदाज और सहायक कलाकारों का योगदान मनोरंजन को बढ़ाते हैं। हालांकि, पटकथा महिला का वेश धारण करने से जुड़ी पुरानी कॉमेडी परंपराओं पर निर्भर रहती है, लेकिन दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए पर्याप्त मजेदार पल पैदा कर लेती है।

महिलाओं और पुरुषों से जुड़ी सामाजिक अपेक्षाओं पर सवाल उठाने की फिल्म की कोशिश प्रासंगिक है, लेकिन लेखन शायद ही कभी परिचित टिप्पणियों से आगे बढ़कर इन विचारों की पड़ताल करता है। निरंतरता से जुड़ी स्पष्ट गलतियां और अनुमान लगाने योग्य रोमांटिक घटनाक्रम भी पूरे अनुभव को कमजोर करते हैं। अपनी सीमाओं के बावजूद नखरेवाली उन दर्शकों के लिए एक अच्छा विकल्प है, जो पसंद आने वाले कलाकारों और भरपूर हंसी के साथ हल्की-फुल्की रोमांटिक कॉमेडी देखना चाहते हैं।

रेटिंग: 3/5

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