डेविड धवन की नई फिल्म ‘है जवानी तो इश्क होना है’ एक बार फिर रिश्तों की गलतफहमियों, लव ट्रायंगल और कॉमिक कन्फ्यूजन की उसी पुरानी दुनिया में ले जाती है, जिसके लिए उनका सिनेमा कभी मशहूर रहा है। लेकिन इस बार कहानी, कॉमेडी और इमोशन-तीनों मिलकर वह असर नहीं छोड़ पाते, जिसकी उम्मीद एक बड़े बजट कमर्शियल एंटरटेनर से होती है।

फिल्म हल्की-फुल्की कॉमेडी के नाम पर आगे बढ़ती है, लेकिन कई जगहों पर यह दोहराव और पुरानी शैली की वजह से थकी हुई महसूस होती है।

फिल्म डिटेल्स

श्रेणीविवरण
फिल्महै जवानी तो इश्क होना है
रिलीज़ की तारीख़5 जून, 2026
जॉनररोमांटिक कॉमेडी / फैमिली ड्रामा
निर्देशकडेविड धवन
लेखकयूनुस सजावल, फरहाद सामजी (संवाद)
कलाकारवरुण धवन, मृणाल ठाकुर, पूजा हेगड़े, जिमी शेरगिल, मनीष पॉल
भाषाहिंदी
शूटिंगभारत / यूनाइटेड किंगडम
रेटिंग2.5/5

कैसी है ‘है जवानी तो इश्क होना है’ की कहानी?

फिल्म की कहानी जस (वरुण धवन) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपनी पत्नी बानी (मृणाल ठाकुर) के साथ रिश्ते में तनाव और अलगाव के कगार पर पहुंच चुका है। शादी के पांच साल बाद दोनों के बीच करियर और परिवार को लेकर टकराव गहरा जाता है।

इसी उलझन के बीच जस लंदन पहुंचता है, जहां उसकी मुलाकात प्रीत (पूजा हेगड़े) से होती है। कहानी तब और जटिल हो जाती है जब बानी और प्रीत-दोनों लगभग एक ही समय पर जस के सामने गर्भावस्था की खबर लेकर पहुंचती हैं।

इसके बाद शुरू होता है झूठ, छिपाने और गलतफहमियों का सिलसिला, जहां जस अपने दोस्त (मनीष पॉल) के साथ मिलकर हालात संभालने की कोशिश करता है। वहीं प्रीत का भाई (जिमी शेरगिल) अपनी सख्त और गुस्सैल मौजूदगी से कहानी में तनाव बढ़ा देता है।

‘है जवानी तो इश्क होना है’ रिव्यू: पुरानी कॉमेडी, नई उम्मीदों पर भारी

फिल्म का सबसे बड़ा मुद्दा इसकी पुरानी सोच पर टिकी कॉमेडी है। डेविड धवन का जो फॉर्मूला 90s और 2000s में दर्शकों को खूब हंसाता था, वह आज के समय में कई जगहों पर आउटडेटेड महसूस होता है।

गलत पहचान, रिश्तों की उलझन और ओवर-द-टॉप कॉमेडी सीक्वेंस कई बार मनोरंजन की बजाय जबरदस्ती खींचे हुए लगते हैं। कहानी में नया कुछ जोड़ने की कोशिश कम और पुराने फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश ज्यादा नजर आती है।

दूसरे हिस्से में फिल्म की पकड़ और ढीली पड़ जाती है, जिससे दर्शकों का इंटरेस्ट लगातार बना नहीं रह पाता।

निर्देशन और स्क्रीनप्ले

डेविड धवन का निर्देशन हमेशा की तरह कमर्शियल टच लिए हुए है, लेकिन इस बार फिल्म में नई ऊर्जा और ताजगी की कमी साफ दिखती है

यूनुस सजावल की कहानी और फरहाद सामजी के संवाद कई जगहों पर कॉमेडी पैदा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन हर पंचलाइन कामयाब नहीं हो पाती। कई सीन ऐसे लगते हैं जैसे वे पुराने बॉलीवुड कॉमेडी सेटअप से उठाए गए हों।

फिल्म का टोन कभी-कभी बहुत बनावटी महसूस होता है, जिससे इमोशनल हिस्से भी प्रभाव नहीं छोड़ पाते।

अभिनय: वरुण धवन की एनर्जी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

वरुण धवन

वरुण धवन पूरी फिल्म में सबसे ज्यादा मेहनत करते नजर आते हैं। उनकी एनर्जी, टाइमिंग और स्क्रीन प्रेजेंस कई जगहों पर फिल्म को गिरने से बचाती है।

मृणाल ठाकुर

मृणाल ठाकुर का किरदार सीमित दायरे में लिखा गया है, जिससे उन्हें ज्यादा एक्सप्लोर करने का मौका नहीं मिलता।

पूजा हेगड़े

पूजा हेगड़े भी अपने रोल में ठीक-ठाक हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें गहराई नहीं देती।

सहायक कलाकार

जिमी शेरगिल, मनीष पॉल, चंकी पांडे और अन्य कलाकार अपने हिस्से की कॉमेडी निभाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन के कारण असर सीमित रह जाता है।

Hai Jawani Toh Ishq Hona Hai Profile
Image Source: X

तकनीकी पक्ष: लोकेशन और म्यूजिक कुछ राहत देते हैं

फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट खासकर लंदन की लोकेशन्स के कारण आकर्षक लगता है। कैमरा वर्क और प्रोडक्शन डिजाइन फिल्म को एक ग्लॉसी लुक देते हैं।

संगीत में पुराने हिट गानों का इस्तेमाल कुछ सीन्स को जीवंत बना देता है, लेकिन यह भी फिल्म की कमजोर कहानी को पूरी तरह नहीं ढक पाता।

क्या अच्छा है?

  • वरुण धवन की दमदार परफॉर्मेंस
  • लंदन की खूबसूरत लोकेशन्स
  • कुछ कॉमिक सीन्स में हल्का मनोरंजन
  • ग्लॉसी प्रोडक्शन वैल्यू
  • बैकग्राउंड म्यूजिक का सपोर्ट

क्या कमजोर है?

पुराना और दोहराव वाला कॉमेडी फॉर्मूला कमजोर और प्रेडिक्टेबल स्क्रीनप्ले दूसरे हाफ में धीमी रफ्तार महिला किरदारों का सीमित लेखन इमोशनल कनेक्ट की कमी

फिल्म देखें या नहीं?

फिल्म देखें अगर:

  • आपको हल्की-फुल्की कॉमेडी पसंद है
  • आप वरुण धवन के फैन हैं
  • आप पुरानी बॉलीवुड स्टाइल एंटरटेनर एंजॉय करते हैं

फिल्म छोड़ सकते हैं अगर:

  • आप नई और फ्रेश स्टोरीलाइन चाहते हैं
  • आपको तेज और स्मार्ट कॉमेडी पसंद है
  • आप लॉजिकल और टाइट स्क्रीनप्ले उम्मीद करते हैं

अंतिम फैसला

‘है जवानी तो इश्क होना है’ एक ऐसी फिल्म है जो अपने पुराने कॉमेडी फॉर्मूले पर पूरी तरह भरोसा करती है, लेकिन बदलते समय के हिसाब से खुद को अपडेट नहीं कर पाती।

वरुण धवन की एनर्जी और कुछ हल्के-फुल्के पल फिल्म को पूरी तरह डूबने से बचाते हैं, लेकिन कमजोर कहानी और पुरानी सोच इसे एक औसत एंटरटेनर से आगे नहीं जाने देती।

रेटिंग: 2.5/5

कुल मिलाकर, यह फिल्म डेविड धवन की पुरानी कॉमेडी विरासत की झलक जरूर देती है, लेकिन उसका असली जादू दोबारा जगा नहीं पाती।