डोरोथी एक तमिल ड्रामा है, जिसका निर्देशन कार्तिक सुब्बाराज ने किया है। फिल्म में सनंत, रिशिकांत और कीर्ति सुरेश अहम भूमिकाओं में हैं। 1990 के दशक के ग्रामीण तमिलनाडु की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म शुरुआत में बचपन की दोस्ती की कहानी लगती है, लेकिन धीरे-धीरे यह कहीं ज्यादा जटिल कहानी में बदल जाती है।
फिल्म दोस्ती, जाति, मर्दानगी, हिंसा, पहचान और सामाजिक उम्मीदों के दबाव को दिखाती है। इसे देखना हमेशा सहज नहीं है और इसके कुछ फैसले जानबूझकर उकसाने वाले महसूस हो सकते हैं। फिर भी, दमदार परफॉर्मेंस, प्रभावशाली विजुअल भाषा और भावनात्मक महत्वाकांक्षा डोरोथी को ऐसी फिल्म बनाती है जो देखने के बाद भी आपके साथ रहती है।
डोरोथी फिल्म की जानकारी
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| फिल्म का नाम | डोरोथी |
| रिलीज़ डेट | 25 सितंबर, 2026 |
| शैली | ड्रामा, क्राइम, थ्रिलर |
| निर्देशक | कार्तिक सुब्बाराज |
| लेखक | कार्तिक सुब्बाराज |
| निर्माता | ज्योति देशपांडे, गुनीत मोंगा कपूर, अचिन जैन |
| मुख्य कलाकार | सनंत, रिशिकांत, कीर्ति सुरेश, मुथुकुमार, गजराज, रामचंद्रन दुरैराज |
| ओटीटी प्लेटफॉर्म | घोषित नहीं |
| अवधि | 2 घंटे 26 मिनट |
| रेटिंग | 3.5/5 |
डोरोथी की कहानी
1995 में मदुरै के पास स्थित एक गांव की पृष्ठभूमि पर बनी डोरोथी बचपन के दोस्तों सुब्बु (सनंत) और कार्थी (रिशिकांत) की कहानी है। अलग-अलग जाति और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद दोनों लड़कों के बीच गहरी दोस्ती हो जाती है। सुब्बु स्थानीय साहूकार वीरैया (मुथुकुमार) का बेटा है। वह आत्मविश्वासी, शारीरिक रूप से मजबूत है और उसके आसपास मौजूद मर्दानगी की पारंपरिक सोच से प्रभावित है। वहीं कार्थी बिना पिता के बड़ा होता है और शुरुआत में सुब्बु को अपना आदर्श मानता है।
उनकी दोस्ती फिल्मों, मार्शल आर्ट्स और इस विश्वास पर टिकी है कि उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता। लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, उनके व्यक्तित्व बदलने लगते हैं। कार्थी धीरे-धीरे ज्यादा आक्रामक हो जाता है और सुब्बु के परिवार द्वारा तय किए गए रास्ते पर चलने लगता है, जबकि सुब्बु पर डाली जा रही हिंसक उम्मीदों से वह लगातार असहज होने लगता है।
डोरोथी (कीर्ति सुरेश) के उनकी जिंदगी में आने के बाद चीजें और बदल जाती हैं। वह सुब्बु के घर में उसके भाई की पत्नी बनकर आती है और अपने साथ गर्मजोशी और भावनात्मक आजादी लेकर आती है, जो उसके आसपास के पुरुषों के लिए अनजान है। कहानी का बाकी हिस्सा इस बात पर केंद्रित है कि जब किरदार उन सच्चाइयों का सामना करने के लिए मजबूर होते हैं, जिनसे वे वर्षों से बचते आए हैं, तब दोस्ती, पहचान और सामाजिक सोच किस तरह आपस में टकराती है।
#Dorothy – ⭐⭐⭐⭐ [4/5] :
— Ramesh Bala (@rameshlaus) September 25, 2026
Director @karthiksubbaraj delivers a beautifully crafted film that blends emotion, romance and drama with his distinctive storytelling touch..@Sananth__ is impressive and natural, bringing both charm and vulnerability to his role..@iam_rishikanth… pic.twitter.com/TDH7t0VkwZ
डोरोथी रिव्यू: बेबाक कहानी, जो सुरक्षित रास्ता नहीं चुनती
डोरोथी की सबसे बड़ी ताकत जोखिम उठाने की इसकी तैयारी है। शुरुआत में जो फिल्म एक जानी-पहचानी ग्रामीण दोस्ती की कहानी लगती है, वह धीरे-धीरे कहीं ज्यादा अंधेरे और अप्रत्याशित क्षेत्र में पहुंच जाती है। कार्तिक सुब्बाराज फिल्म के पहले हिस्से में सुब्बु और कार्थी की दोस्ती को काफी विस्तार से स्थापित करते हैं।
यह धीमी शुरुआत इसलिए महत्वपूर्ण बन जाती है क्योंकि आगे चलकर उनका रिश्ता ऐसी परिस्थितियों में पहुंच जाता है, जिनसे निपटने के लिए दोनों तैयार नहीं होते। फिल्म मर्दानगी की उस सोच पर भी सवाल उठाती है, जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लगातार पहुंचती रहती है। यहां हिंसा को सिर्फ एक एक्शन एलिमेंट के रूप में नहीं दिखाया गया, बल्कि इसे इस तरह पेश किया गया है कि यह पुरुषों के खुद को समझने के तरीके को प्रभावित करती है।
स्क्रीनप्ले कई बेहद साहसी मोड़ लेता है। हर फैसला समान रूप से काम नहीं करता और दूसरा हिस्सा कभी-कभी जरूरत से ज्यादा प्रभाव डालने की कोशिश करता है। कुछ दृश्यों को छोटा किया जा सकता था, जबकि कुछ भावनात्मक संघर्ष जरूरत से ज्यादा खींचे गए हैं। फिर भी, जानी-पहचानी तमिल सिनेमा की फॉर्मूलाबद्ध कहानियों को चुनौती देने की फिल्म की कोशिश इसे एक सीधी ग्रामीण क्राइम ड्रामा से ज्यादा दिलचस्प बनाती है।
Also Read: विजय ने रश्मिका की Mysaa Teaser को बताया बेहद शानदार
सनंत, रिशिकांत और कीर्ति सुरेश ने संभाली फिल्म की कमान
सनंत सुब्बु के रूप में फिल्म की सबसे परतदार परफॉर्मेंस में से एक देते हैं। उन्हें ऐसे किरदार को निभाना है, जिसकी खुद को समझने की सोच काफी बदलती है और उनकी परफॉर्मेंस में कमजोरी और उलझन दोनों नजर आती हैं। रिशिकांत भी कार्थी के रूप में उतने ही प्रभावी हैं। एक शांत लड़के से हिंसा से प्रभावित व्यक्ति में उनका बदलाव विश्वसनीय लगता है, खासकर इसलिए क्योंकि यह परिवर्तन धीरे-धीरे होता है। दोनों कलाकारों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म का अहम हिस्सा है।
शुरुआती हिस्सों में उनकी दोस्ती वास्तविक लगती है, जिससे बाद में उनके रिश्ते का टूटना और ज्यादा भावनात्मक प्रभाव डालता है। कीर्ति सुरेश डोरोथी के किरदार में गर्मजोशी और संवेदनशीलता लेकर आती हैं। उनका किरदार हिंसा और कठोर उम्मीदों से भरी दुनिया में एक अलग तरह की भावनात्मक संभावना को दर्शाता है। सहायक कलाकार भी मजबूत योगदान देते हैं, खासकर वीरैया के रूप में मुथुकुमार, जिनकी मौजूदगी उस सामाजिक माहौल को स्थापित करने में मदद करती है जिसमें दोनों दोस्त बड़े होते हैं।
#Dorothy Second Half ⭐️
— CinemaXverse (@CinemaXverse) September 25, 2026
• A BIG tonal shift! The raw rural drama transforms into a bold, message-driven road drama.
• #Sananth absolutely owns the second half! 🔥 The single-shot sequence is a standout, with several moments where he completely carries the frame.
•… pic.twitter.com/GxCKoV2vSK
म्यूजिक और विजुअल अपील
फिल्म की विजुअल प्रस्तुति इसकी सबसे बड़ी खूबियों में से एक है। ग्रामीण माहौल को जगह की मजबूत समझ के साथ फिल्माया गया है, जबकि सिनेमैटोग्राफी गांव को खूबसूरत और खतरनाक दोनों महसूस कराती है। फिल्म के सबसे दिलचस्प विजुअल विकल्पों में से एक इसके अतीत और वर्तमान के टाइमलाइन के बीच का अंतर है। रंगों और ब्लैक-एंड-व्हाइट इमेजरी का इस्तेमाल दोनों दौरों को अलग करने के साथ-साथ किरदारों की बदलती भावनात्मक स्थिति को भी दर्शाता है।
कई तनावपूर्ण दृश्यों में लंबे शॉट खास तौर पर प्रभावी हैं। तेजी से शॉट बदलने के बजाय कैमरा अक्सर किरदारों के साथ बना रहता है और दर्शकों को उस पल की भौतिकता को महसूस करने देता है। इलैयाराजा का संगीत एक और बड़ी परत जोड़ता है। हिंसक दृश्यों के दौरान बैकग्राउंड स्कोर गरजदार हो जाता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर यह शांत और ज्यादा भावुक भी हो जाता है। एकमात्र समस्या फिल्म की 146 मिनट की अवधि है, जिसके कारण कुछ हिस्से खिंचे हुए महसूस हो सकते हैं। केंद्रीय विचार प्रभावशाली हैं, लेकिन दूसरे हिस्से को ज्यादा टाइट एडिटिंग का फायदा मिल सकता था।
कमजोर पक्ष क्या हैं?
- लंबा दूसरा हिस्सा
- जरूरत से ज्यादा सीधा संदेश
- असमान गति
- डोरोथी का अधूरा किरदार
क्या डोरोथी देखना चाहिए?
इसे देखें अगर आप:
- बेबाक ड्रामा पसंद करते हैं
- कार्तिक सुब्बाराज की फिल्में पसंद करते हैं
- गैर-पारंपरिक कहानियां पसंद करते हैं
- दमदार परफॉर्मेंस की सराहना करते हैं
इसे छोड़ दें अगर आप:
- हल्का-फुल्का मनोरंजन चाहते हैं
- धीमी कहानियां पसंद नहीं करते
- सीधा-सादा ड्रामा पसंद करते हैं
- गंभीर विषयों से बचते हैं
#Dorothy - Review#Dorothy Is A Bold And Genre-Bending Period Drama🔥 Set In Rural Tamil Nadu During The 1990s, Following Two Childhood Friends, #Karthi And #Subbu, Whose Unbreakable Friendship Is Shaped By Caste Divisions, Gang Violence, Toxic Masculinity And The Conservative… pic.twitter.com/UIchEldGZt
— Cinemy (@HdUpdatesMovie1) September 25, 2026
अंतिम फैसला
डोरोथी आसान फिल्म नहीं है और यही इसकी दिलचस्प बातों में से एक है। कार्तिक सुब्बाराज एक जानी-पहचानी दोस्ती की कहानी को धीरे-धीरे जाति, मर्दानगी, हिंसा और पहचान की पड़ताल में बदल देते हैं। सनंत और रिशिकांत फिल्म को भावनात्मक आधार देते हैं, जबकि कीर्ति सुरेश एक जटिल किरदार में गरिमा लेकर आती हैं।
विजुअल्स और इलैयाराजा का संगीत माहौल को और मजबूत बनाते हैं। फिल्म अपने आखिरी हिस्सों में थोड़ी असमान हो जाती है और इसके कुछ संदेश जरूरत से ज्यादा सीधे महसूस होते हैं। फिर भी, इसकी महत्वाकांक्षा, परफॉर्मेंस और पूरी तरह अप्रत्याशित दिशा में जाने की कोशिश डोरोथी को एक यादगार अनुभव बनाती है।
रेटिंग: 3.5/5
Also Read: The Paradise रिव्यू: नानी की अदाकारी और अनिरुद्ध का संगीत फीका

