अनुराग कश्यप की फिल्म 'बंदर' एक ऐसी सामाजिक-राजनीतिक ड्रामा है, जो सिर्फ मनोरंजन नहीं करती बल्कि कई असहज सवाल भी खड़े करती है। फिल्म मीटू आंदोलन, झूठे आरोपों की बहस, मीडिया ट्रायल और भारतीय जेल व्यवस्था की भयावह सच्चाइयों को सामने लाने की कोशिश करती है। यह कहानी न्याय और पूर्वाग्रह के बीच की उस पतली रेखा को तलाशती है, जहां सच और धारणा अक्सर एक-दूसरे में उलझ जाते हैं।

बंदर मूवी डिटेल्स

श्रेणीविवरण
फिल्मबंदर
जॉनरक्राइम ड्रामा / सोशल थ्रिलर
निर्देशकअनुराग कश्यप
लेखकसुदीप शर्मा, अभिषेक शर्मा
कलाकारबॉबी देओल, सान्या मल्होत्रा, सपना पब्बी, इंद्रजीत सुकुमारन
भाषाहिंदी
रिलीजसिनेमाघरों में
रेटिंग3/5

कैसी है 'बंदर' की कहानी?

फिल्म की कहानी टीवी इंडस्ट्री के लोकप्रिय चेहरे समर मेहरा (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है। 50 वर्षीय समर की जिंदगी तब पूरी तरह बदल जाती है, जब उसे एक रेप केस में गिरफ्तार कर लिया जाता है। यह आरोप गायत्री आनंद (सपना पब्बी) लगाती है, जिससे उसकी मुलाकात एक डेटिंग ऐप के जरिए हुई थी।

समर खुद को लगातार निर्दोष बताता है, लेकिन हालात उसके खिलाफ होते जाते हैं। उसकी बहन सुहानी (सान्या मल्होत्रा) उसके बचाव के लिए आगे आती है और कानूनी लड़ाई शुरू होती है।

मामला केवल अदालत तक सीमित नहीं रहता। जेल के अंदर समर को शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। वहां मौजूद गुटबाजी, हिंसा और सत्ता संघर्ष उसकी मुश्किलों को और बढ़ा देते हैं। इसके बाद कहानी एक ऐसे व्यक्ति के संघर्ष को दिखाती है, जो अपनी पहचान, सम्मान और मानसिक संतुलन बचाने की कोशिश कर रहा है।

बंदर रिव्यू: साहसी विषय लेकिन कमजोर पड़ती रफ्तार

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका विषय है। बंदर उन मुद्दों पर चर्चा करती है जिन पर अक्सर खुलकर बात नहीं की जाती। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या कानून का दुरुपयोग संभव है और क्या समाज आरोप लगते ही किसी व्यक्ति को दोषी मान लेता है?

जेल के दृश्यों को काफी यथार्थवादी तरीके से पेश किया गया है। गंदे शौचालय, भीड़भाड़ वाली बैरकें, भ्रष्टाचार और कैदियों की अमानवीय परिस्थितियां दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं।

फिल्म यह भी दिखाती है कि जेल के अंदर मौजूद अपराधी भी यौन अपराध के आरोपियों को अलग नजर से देखते हैं। यही पहलू कहानी को और अधिक जटिल और दिलचस्प बनाता है।

हालांकि, दूसरे भाग में फिल्म की गति धीमी पड़ जाती है। कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब नहीं मिलते और कई घटनाएं अधूरी महसूस होती हैं। इससे कहानी का प्रभाव थोड़ा कमजोर हो जाता है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

अनुराग कश्यप ने फिल्म को यथार्थवादी अंदाज में पेश किया है। उन्होंने विषय को सनसनीखेज बनाने की बजाय उसके सामाजिक और मानसिक प्रभावों पर ज्यादा ध्यान दिया है।

प्रोडक्शन डिजाइन और आर्ट डायरेक्शन जेल के माहौल को बेहद वास्तविक बनाते हैं। हर फ्रेम में घुटन और बेचैनी महसूस होती है।

सिनेमेटोग्राफर शाजी रिजवी ने कहानी के गंभीर माहौल को प्रभावी ढंग से कैमरे में कैद किया है। बैकग्राउंड स्कोर भी तनाव और रहस्य को बनाए रखने में मदद करता है।

हालांकि संपादन अधिकांश हिस्सों में सधा हुआ है, लेकिन फिल्म का दूसरा भाग थोड़ा और कसा हुआ हो सकता था।

अभिनय: बॉबी देओल ने संभाली पूरी फिल्म

बॉबी देओल

फिल्म का पूरा भार बॉबी देओल के कंधों पर है और वह इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हैं। एक ऐसे व्यक्ति की मानसिक स्थिति को उन्होंने प्रभावशाली ढंग से दिखाया है, जिसकी पूरी दुनिया अचानक बिखर जाती है।

सान्या मल्होत्रा

सान्या मल्होत्रा एक सहायक बहन की भूमिका में भावनात्मक मजबूती लेकर आती हैं। सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद वह प्रभाव छोड़ती हैं।

सपना पब्बी

गायत्री के किरदार में सपना पब्बी ने संतुलित अभिनय किया है। उनका किरदार दर्शकों को लगातार सोचने पर मजबूर करता है।

सहायक कलाकार

इंद्रजीत सुकुमारन जेल के दबंग कैदी लिजो के रूप में प्रभावशाली हैं। जितेंद्र जोशी और नागेश भोसले भी अपनी छोटी भूमिकाओं में याद रह जाते हैं।

क्या अच्छा है?

  • बॉबी देओल की दमदार परफॉर्मेंस
  • जेल जीवन का यथार्थवादी चित्रण
  • सामाजिक मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी
  • प्रभावशाली तकनीकी प्रस्तुति
  • मजबूत पहला भाग

क्या कमजोर है?

  • धीमा दूसरा भाग
  • कुछ सवालों के जवाब नहीं मिलते
  • कहानी कहीं-कहीं खिंची हुई लगती है
  • भावनात्मक प्रभाव पूरी तरह नहीं बन पाता

फिल्म देखें या नहीं?

फिल्म देखें अगर:

  • आपको गंभीर और सामाजिक विषयों वाली फिल्में पसंद हैं।
  • आप यथार्थवादी जेल ड्रामा देखना चाहते हैं।
  • बॉबी देओल के अभिनय के प्रशंसक हैं।
  • सोचने पर मजबूर करने वाली कहानियां पसंद करते हैं।

फिल्म छोड़ सकते हैं अगर:

  • आपको तेज रफ्तार मनोरंजक फिल्में पसंद हैं।
  • आप हल्की-फुल्की फैमिली एंटरटेनर ढूंढ रहे हैं।
  • धीमी गति वाली फिल्मों से परहेज करते हैं।

अंतिम फैसला

'बंदर' एक महत्वाकांक्षी फिल्म है जो कई संवेदनशील और विवादित मुद्दों को उठाने का साहस करती है। फिल्म हर सवाल का जवाब नहीं देती, लेकिन दर्शकों को सोचने के लिए मजबूर जरूर करती है।

बॉबी देओल का दमदार अभिनय, जेल जीवन का वास्तविक चित्रण और अनुराग कश्यप की गंभीर प्रस्तुति इसे एक अलग अनुभव बनाती है। हालांकि कमजोर स्क्रीनप्ले और धीमी गति फिल्म को पूरी तरह ऊंचाई तक पहुंचने से रोकते हैं।

रेटिंग: 3/5

कुल मिलाकर, बंदर एक ऐसी फिल्म है जो अपनी कमियों के बावजूद चर्चा के लायक है और गंभीर सिनेमा पसंद करने वालों को निराश नहीं करेगी।